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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

#वंचित स्वर (51)

सर्द हवा हो या हो चिलचिलाती गरमी ,
बहाता निरन्तर पसीना खूब परिश्रमी।
मयस्सर नहीं उसको दो जून रोटी भी,-
फिरभी हौसलों में, नहीं होती कोई कमी।
            सूरत बदलना चाहते हैं, वे इस पहाड़ की,
            सामने खड़ी हैं उनकी, ये पीड़ पहाड़ सी।
            मालिक लपकते हैं,जौंक की तरह शहर में,
            जो अनवरत चूस रहे हैं,लहु उनके हाड़ की।
लाचार मेहनतकशों की,परवाह किसको पड़ी है?
उनके हकों की लड़ाई,अब तक किसने लड़ी है।
देखिए कुछ तो इधर, राजनीति की बदहाली को।
जिसका कतरा कतरा,जमीन पर बिखरी पड़ी है।
             यूं बुत की तरह खड़े रहना,अच्छा नहीं लगता।
             जंग में सिपाही का भागना,अच्छा नहीं लगता।
             कुछ तो सोचना होगा,देश के नव निर्माण के लिए,
             भीड़ में शामिल तमाशा देखना अच्छा नहीं लगता।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

भौनी दा(27)

दगड़ू भौनी दा,जनुहैं भवान सिंह कौंनी।
आज कल अब ऊं बल दिल्ली हौन रौनी ।
हम ननछना बटि स्कूल,एक दगड़ै  गय।
एकै स्कूलम, हम एकै दर्जम दगड़ै रय।
हमुलि गुल्ली डंडा,घुसघुसि दगड़ै खेलि।
बटपन लुुुुकण पणज्यू मार दगड़ै झेलि।
हम एक बटी दस तक स्कूल दगड़ पढ़।
जो साल पास हय और वी साल विछड़।
अपण दद दगै भौनी दा तलि हैंणि नै गय, 
इज बौज्युक लाडिल हम घर पनै रै गय।
साल द्वी साल तक चिठि पतर लिखनै रय।
बखतक दगड़, फिरि हमलै सब भूलि गय।
भौनीदा कैं वेति दिल्लीक हवा रास ऐगे ।
घरपन मेरि मास्टरीक बस एक तलाश रैगे। 
कब ब्या हौय ? यूॅ कब नन तिन हय ?
बचपना दिन अपण हम  सब भूलि गय।
घरपन सैंणिक कचकचाट  सुणनैं रय।
राती ब्याव हम स्वीणोंक जाव बुणनें रैगय ।
येति दिन रात हम दौड़नै रिश्त बड़नैं गय।
य उमरकि किताबक हर पन्न पलटनै रय।
लोगोंल बतायआज भौनी दा घर ऐ रैंई।
अपण दगै ननतिन पहाड़ घुमुहणि ल्य रैंई।
मैं ब्याव एक झप्पाक  मिलहणि क्य गोय।
चहा  पीनैं गपशप  मारनैं झित वैं रै गोय।
उमर बिति हम पहाड़ हैंणि के नि कर सक।
अपण ठाठ-बाट मारनैं रै गय कोरि फसक।







गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

# मुल मुल हंसनै रया (28)

मिठ-मिठ, भौल बुलानें रया।
खितखित,मुलमुल  हंसनै रया।
            खुटों तुमर कभैं कन झन बुड़ौ।
            मूण कभैं क्वे आँस झन पड़ौ।
             सगुन आंखर तुम लेखनैं रया।
             खित खित,मुल मुल हंसनैं रया।
             नौंसाल तुमुहैंण दैंण है जाऔ।
              दूधभात खूब  खैहण है जाऔ।
              अणी जणियां क्वे भूख न रहौ।
              नाजैल भकार तुमरभरीयै रहौ।
अपण -पराय सब देखनैं रया।
खित खित,मुलमुल हंसनैं रया ।
             घर-बौंण डव बोटि हरिया रहैं।
             खल्यत रुपयोंल तुमरभरियै रहैं।
             बट-घट,व्यापारम  बरकत  रहौ।
             धिनाईल ठेकि-डौकौ भरियै रहौ।
दिन-रात भल स्वींण देखनै रया।
खित खित,मुल मुल हंसनै रया।
             तुमूपरि कभैं कैक दोष न लागौ।
             रौल गध्यरोंक छौव कभैं न जागौ।
             खुशि देखिक चौड़ चाकौ है जया।
             सबोंकैं उज्याव तुम दिखानैं रया।
द्यप्तोंक थानम,तुम द्यू बावनै रया।
खित -खित,मुल- मुल हंसनैं रया।
            नौं साल पारि, तुम नौं गीत गाया।
             परदेश जाई छैं,उनुकैं घर बुलाया।
            अपण मुलुक कैं,छोड़ि झन जया।
             ननों कैं रोजगार,तुम एती दिलाया।
फूलदेई घी त्यौहार, एती मनाया।
खित-खित,मुल- मुल  हंसनैं रया।
           बीती बातों कैं अब भूलि जाणौ।
           बखत कैं नौं उज्याव दिखाणौ।
           खेती-बाड़ीक नई नीति बनाणौ।
           भरपूर फसल फल फूल उगाणौ।
नौं साल पारि सब नौं गीत गाया ।
खित-खित,मुल-मुल  हंसनैं रया।
 

रविवार, 26 अगस्त 2018

🔰एक नया त्यौहार मनाऐं (52)

एक नया त्यौहार मनाऐं,हम खुशियों से परिवार सजाऐं।

कभी राग न  द्वेष किसी से,कभी न हो विद्वेष किसी से।
हिल मिल रहकर देखें सपना,ऐसा लगे  घर  हो अपना।
अगर रूठ कर कोई बिछुड़े  मिलकर सब उसे मनाऐं।
हम एक नया त्यौहार मनाऐं ,खुशियों से संसार सजायें।
      
जाति धर्म की बात न हो,किसी से अशिष्ट संवाद न हो ।
रिश्तों में हो प्रेम समर्पण प्रबुद्ध राष्ट्र को सब हो अर्पण।
समृद्ध राष्ट्र ,समृद्ध समाज को,मिल कर स्वस्थ बनाऐं ।
हम एक नया त्यौहार मनाऐं खुशियों से संसार सजाऐं ।
      
यहां कोई पूरब पश्चिम रहता,कोई उत्तर दक्षिण वासी ।
भाषा वेश रंग भले अलग हों,हम सब हैं भारतवासी ।
भेदभाव का भ्रम तोड़कर,सुन्दर सा उपहार सजाऐं।
एक नया त्योहार मनाऐं खुशियों का परिवार बनाऐं।



शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

🌹प्रातः स्मरणीय व्यक्तित्व -मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा 🌹

उत्तराखंड में शिल्पकारों के प्रेरणास्रोत रहे  हैं स्वoरायबहादुर मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा।वे सम्पूर्ण उत्तराखंड में ही नहीं,अपितु जहाॅ भी प्रवासी शिल्पकार हैं बड़े गर्व के साथ उनकी जयन्ती मना कर उन्हें याद करते हैं और  उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हैं।आज अम्बेडकरी चेतना के फलस्वरूप समाज सुधार के लिए उनके प्रयासों को दृष्टिगत कर उनको उत्तराखंड का अम्बेडकर कहा जाता है।स्वoरायबहादुर मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा जी का जन्म 26अगस्त1887 को अल्मोड़ा में हुआ ।उनके पिताजी का नाम गोविंद प्रसाद तथा माता जी का नाम गोविंदी देवी था।सन् 1892 में प्राइमरी शिक्षा और1902 में हाईस्कूल परीक्षा उन्होंने उच्च श्रेणी में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की।प्रतिभा के धनी स्वo हरिप्रसाद टम्टा जी के लिए तत्कालीन परिस्थितियां बड़ी कठिन थी ।जहाॅ  कि एक ओर देश की आजादी के लिए संघर्ष और दूसरी तरफ जातीय अस्पृश्यता का घोर दंश।संघर्ष के इस दौर में उनको भी अपनी भूमिका निर्धारित करनी थी।उन्होंने सन्  1905 में शिल्पकारों की दशा सुधारने के लिए  टम्टा सुधारिणी सभा का गठन किया जो आगे चलकर शिल्पकार सभा के रूप में परिवर्तित  हो गई।तत्कालीन समय पूर्ण रूप से समाज सुधार के दौर से गुजर  रहाथा।कुमाऊऔर गढवाल लोग धर्मांतरण कर रहे थे समाज में    छुआछूत जैसी कई सामाजिक बुराइयाॅ थी।शिल्पकार शोषित और असंगठित थे।
               कुमाऊ गढवाल मेंआर्य समाज जैसी संस्थाओं के माध्यम से धर्मांतरण  रोकने और अस्पृश्यता उन्मूलन के कार्यक्रम चलाए जा रहे थे ।कुमाऊ में स्व.खुशीरामआर्य तथा गढ़वाल में जयानन्द भारती शिल्पकारों के शुद्धिकरण के लिए जनेऊ आन्दोलन कर रहे थे तो इधर स्व हरिप्रसाद टम्टा जी शिल्पकारों के लिए सरकार से  बेहतर शिक्षा की सिफारिश कर रहे थे,और आर्थिक विकास को लेकर संघर्षरत थे।स्व.टम्टा जी ने कई विद्यालय खोल कर शिल्पकारों के लिए शिक्षा का प्रबंध किया।वे एक कुशल  पत्रकार भी थे उन्होंने 1934 में समता साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन कर शिल्पकार समाज को जागरूक करने एवं उनके साथ हो रहे अमानवीय अत्याचारों को प्रकाशित करने का कार्य किया।अल्मोड़ा जिला बोर्ड के मनोनीत सम्मानित सदस्य भी  रहे।उनकी प्रतिभा को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने उन्हें 1935 में विशेष मजिस्ट्रेट मनोनीत किया।उन्होंने कई शिल्पकार सम्मेलनों        की अध्यक्षता की सम्मेलनों के माध्यम से शिल्पकारों के लिए भूमि
आवंटन के लिए संघर्ष किया।आज आजादी के सात दशक बाद भी
शिल्पकार वर्ग सामाजिक आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से उपेक्षित है। उनकोबोट बैंक के रूप में उपयोग किया जा रहा है।आज हरिप्रसाद टम्टा जी की प्रासंगिकता अधिक है उनके जीवन दर्शन को आज समझने की आवश्यकता है ताकि लोगआर्य समाज की जकड़न से    बाहर निकलकरअम्बेडकरीविचारों को समझें।शिल्पकारों को अब  इस दिशामें हमकोअम्बेडकरी विचारों को प्रोत्साहित एवं प्रसारित करने की आवश्यकता है।
        समतामूलक समाज के लिए सही बुद्ध का सत्पथ ही है।यही स्व.मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा जी की मंशा रही होगी।इसी श्रद्धा के साथ उन्हें कोटि-कोटि नमन।


गुरुवार, 16 अगस्त 2018

श्रद्धांजलि

तुम अटल, विश्वास अटल ,तुम्हारा ज्ञान अटल था ।
काल चक्र के साथ तुम्हारा हरअभियानसफल था।
तुम बढते गये निरन्तर,तुमने कभी हार नहीं मानी।
तुम मानवता से परिपूर्ण  थे निर्भीक स्वाभिमानी।
तुम जनप्रिय जन नायक नव युग प्रेरणा दायक थे।
जाति धर्म सम्प्रदाय से ऊपर राष्ट्र धर्म सहायक थे।
तुम कवि लेखक रचना धर्मी प्रखर वक्ता युगदृष्टाथे।
इस नवभारत निर्माण के तुम निर्भय अभिकर्ता थे।
हो गये आज तुम मौन! काल चक्र भी रुक गया है।
हे अटल !श्रद्धांजलि !ये राष्ट्रध्वज भी  झुक गया है।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।  !      भावपूर्ण श्रद्धांजलि  !

सोमवार, 30 जुलाई 2018

# बरषने दो(53)

बरषने दो बादलों को आज जी भरकर ।
आने दो हवाओं को थोड़ा तूफान बनकर।
हम भी देखते हैं कितना दम है इनमेंआज,
खड़े हैं हम भी यहाॅ अपना  सीना तानकर।
                जानते हैं बादल दो-चार दिन बरसेंगे।
                इनको हवायें कहीं उड़ाकर ले जायेंगे।
                छोड़ जायेंगे जमीं अपनी खामोशियां।
                हम ही उनको खुशियाॅ लौटाने आयेंगे।
बादल नहीं होते, मगर झुलसाती गर्मियां-
होती ,ये हाड़ कपकपाने वाली वो सर्दियां। 
सीख लेते हैं बादलों से उड़ना आसमां में,
छोड़कर आ गये हैं जो अपनी हठधर्मियां।
               बहुत देखा है हमने भी बादलों का फटना।
               लोगों काअन्धेरों से भरे  राहों में भटकना ।
               मगर सम्भलते हैं अपनी राहों में वो अक्षर-
               जो भिज्ञ हैं जीवन में स्वयं सन्तुलन रखना।
               

शनिवार, 21 जुलाई 2018

पर्यावरण (54)


 
क्षीण होआवरण तो जनअसहज होता।
मनआवरण की मलिनता को देख रोता।
हर रोज सुन्दर आवरण की चाह लेकर,
मन स्वस्थ रहने को स्वप्न नया देख लेता।
आवरण की हो सुरक्षा रहे सुन्दरता भी। 
सुरक्षाअभियान है दिवस पर्यावरण की।
एक आवरण ही तो है हमारा पर्यावरण ,
जो सुरक्षा कर रही है हर प्राणियों की।

प्रकृति के उपहारों से सुसज्जित है धरा,
देखने की लालसा है इसे सदा हरा-भरा।
चाहते हैं परिपक्वता जन आचरण की।
हो हमारे सामने अचल हिमाल सा खड़ा।
आचरण ही धम्म है ये बात मेरे राष्ट् की।
सुरक्षा अभियान ये दिवस पर्यावरण की।
संकल्प लें अब कभी कोई वृक्ष न काटे,
करेंगे सुरक्षा हम हर एकअभ्यारण्य की।

यहाॅ लोगों ने प्रकृति पर बड़े जुर्म ढ़ाये हैं।
खूब दोहन कर उन्होंनेअपनेघर सजाये हैं।
मौजमस्ती में प्लास्टिक काअक्षय कचडा,
फैलाकर यूँ  बरबादियों के दिन गिनाये हैं।
हमें ही रोकना होगा संकट आपदाओं की।
सुरक्षा अभियान यह दिवस पर्यावरण की।
विश्व पर्यावरण दिवस पर मंगलकामनाऐं। प्रकृति प्रेम होऔर हो संवाद संरक्षण की।



          

रविवार, 8 जुलाई 2018

# बेचारी कविता

गांव से अलग उस बस्ती में, 
  यह बेचारी कविता रहती है। 
     दुत्कार तिरस्कार अपमान -
       वहां बहुत कुछ सहती है।
उसे विरासत में मिला कल,
  एक अदद घर शीलन भरा।
    परिवार समय में समा गया ,
     पहले मां औरअब बाप मरा। 
अब तो  घर  भी उजड़ गया,
  बस खाली  चिंता  है मन में।
    रातों की सिलवट जैसे कुछ, 
     बिखरी  हैं  यादें आंगन  में।
बस्ती की सीमा में  अब  तो,
   पीपल का  तरु उग आया।
     काम से लौटा करती जब वो,
        पाती है उस तरु से छाया।
इस तरुवर  के  नीचे  प्रतिदिन, 
   वह  अ आ क ख पढ़ती है।
    अपने बस्ती के बच्चों के संग ,
      वह मिलकर आगे बढती है।
उसने समय के साथ साथ,
  पढना लिखना सीख लिया।
    अपने मधुर स्वभाव से उसने,
       लोगों का दिल जीत लिया।
आजादी की परिभाषा अब,
    लोगों को समझाती है वह।
     स्वतंत्रता अधिकार हमारा,
      हर बच्चे को बतलाती है वह।
वह पढ़ती है वह लिखती है, -
  हर हक की लड़ाई लड़ती है।
    उस गांव से बाहर उस बस्ती में,
      आज मेधावी कविता रहती है। 
                              


शनिवार, 7 जुलाई 2018

आओ मेरी बस्ती में (56)

संसद को रास्ता यहीं से जाता है।
शायद तुमको याद नहीं।
तुम पिछली बार भी आए थे,
तुमने भी अपने पोस्टर बैनर लगाए थे।
शायद तुमको याद नहीं।
तुम कहते हो भारत अखंड हो ।
भ्रष्टाचारियों के लिए दंड हो।
फिर क्यों भारत खंड खंड हो रहा है ।
संसद निर्द्वन्द सो रहा है ।
निस्तब्धता क्यों है इन वस्तियों में।
क्यों आदमी बेजान हो रहा है ।
शब्दमकड़जाल मत बुनो।
वंचितों के स्वर सुनो।
यहीं अयोध्या है यहीं राम भी।
यहीं गीता यहीं संविधान भी ।
आओ मेरी बस्ती मेरे गांव में ।
उस विशाल पीपल की छांव में।
तुम्हारा तन मन शुद्ध होगा ।
हमारा भारत  प्रबुद्ध होगा ।
शांति अमन मानवता होगी ।
प्रेम बन्धुत्व समानता होगी ।
न कभी किसी में द्वन्द्व होगा।
भारत तभी अखण्ड होगा ।
आओ मेरी बस्ती मेरे गांव में।
उस विशाल पीपल की छांव में।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

# विश्वास

जब घटाओं के आगोश में आकाश हो ।
मनअकेला तन्हा कोई नआस-पास हो ।
तुमको निर्भय होकर बढ़ना है निरन्तर -
नव सृजन के लिए मन में पूर्णविश्वास हो ।
            लगता है इन घटाओं से कुछ बारिश हो जाय।
            सूखी डाल को फिर कोई वारिस मिल जाय।
            अनगिनत कोपलें फूटें फूलों से चमन महके ।
            हवावों से कह दो अधूरी न ख्वाहिश रह जाय।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

# रखें स्वच्छता चारों ओर

हम रखें स्वच्छता चारों ओर ।
           अपना  घर हो या हो स्कूल, मजबूत हमारे हों उसूल ।
            घर स्कूल की करें सफाई इसी में सबकी छुपी भलाई ।
            बच्चो उठो अब हो गया भोर,रखें स्वच्छता चारों ओर ।
घर को स्वच्छ हर माँ रखती,सभी बच्चों में सद् गुण भरती ।
हमको चलना वही सिखाती।गिर गए अगर तो वही उठाती।
नहीं रहेंगे अब कभी कमजोर।हम रखें स्वच्छता चारों ओर।
         आन स्वच्छता मान स्वच्छता हो सबका अभियान स्वच्छता।
         स्वागत हो इसअभियान का,परिणाम भला हो इम्तिहान का।
         संस्कार जगा आलस्य छोड़,हम रखें स्वच्छता चारों ओर ।
        

रविवार, 1 जुलाई 2018

# मौत की डगर

जीएमओ की बस गिर गई, सैंतालीस लोग मर गये ।
एक झटके में कितने, परिवारों के सपने बिखर गये।
नैनीडांडा क्वीन गांव के पास ही, हुआ है यह हादसा ।
हंसते हुए निकले थे घरों से, क्यों काल आ गया सहसा ।
मच गई चित्कार खाई में, कुछ मौन हुए कुछ घायल थे ।
मरने वालों में, कुछ महिला बच्चे बूढ़े जवान सामिल थे।
इस होनी को अनहोनी को, हम भाग्य कहैं या भूल कहैं ।
किस किस को दोषी ठहरायें ,हम कैसे गुनाह कबूल करें ।
उत्तराखंड पृथक राज्य हो,हमने कितने सपने संजोए थे ।
उन जनसंघर्षों में सहभागी होकर कितने लाल खोये थे ।                                 भूल गये विकास की राहों को,दूर दराज पहाड़ी गावों को।
              बिजली पानी सड़क परिवहन शिक्षा की समस्याओं को ।
             बस नेता बनने की चाहत में,  सब मर्यादाएं तोड़ चुके हैं ।
             हैं चोर चोर मौसेरे भाई ,आपस में  सब गठजोड़ चुके हैं ।
           धिक्कार है ऐसे नेताओं को, यहाॅ जो झूठे गाल बजाते हैं ।
          सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली, कभी हज करने में न सरमाते हैं।
            नेता नैतिकता का पाठ छोड़ दे,तब सत्ता का मद चढ़ता है।
      सरकारों की नाकामी से ही यहाॅ अपराधों का दर बढ़ता है ।
हम भी देश के नागरिक हैं, हमभी हैं उतने ही उत्तरदायी ।
जीवन है अनमोल सभी का ,क्यों  करें कभी लापरवाही ।
घटना से आहत मेरा मन अर्पित करता है ये शब्द सुमन ।
हे चिरविश्रामी -शांति- शांति -शान्ति हो शांति नमन ।


शुक्रवार, 22 जून 2018

#वंचित स्वर # हल्ला बोल

सरकार चलाओ ,हल्ला बोल कर ।
सरकार गिराओ ,हल्ला बोल कर।
          उनका भी हल्ला,इनका भी हल्ला ।
          आपस में झल्ला, जनता को बहला ।
सब के सब हैं,एक थैली के चट्टे बट्टे।
यूॅ ही चला रहे हैं ,राजनीति के सट्टे ।
           ये  कभी इधर हैं, तो कभी उधर हैं।
            पता नहीं है कि कब कौन किधर हैं ।
गिरगिट की तरह ,खूब रंग बदले हैं ।
ये धरम जाति की खूब चाल चले हैं ।
             इनको  बस कुर्सी की हवस होती है।
             बेचारी जनता तो जीवन भर रोती है ।
क्या सोच सके हैं क्यों बंचित जन है ?
नेता के पास कितना संचित धन है ? 
              अब उठ जा तू भी ये हल्ला बोल ।
               सोच समझकर अपना मत तोल ।

गुरुवार, 21 जून 2018

# नास्तिक बोलता है ----(60)

  • क्यों तुम मौन हो? तुम क्योंअसमर्थ हो? 
पत्थरों में खोजते क्यों जीवन केअर्थ को।

बाहर भूखी भीड़ है बेबस लाचार खड़ी ,

बेजान पत्थरों पर उनकी आस्था जड़ी।

मकडजाल शब्दों के तथ्य हैं तर्कों से परे।

संवेदन हीन भीड़ में सबके सब हैं बहरे।

मुश्किल है समझाना परअसम्भव भी नहीं।

आस्तिक से नास्तिक हो जाना हैअच्छा कहीं।

कहता है जाग जाओ,भीड़ के पीछे न जाओ।

शिक्षित बनो तर्क करो जीवन में संघर्ष करो।

नास्तिक जो तर्क करता बुद्धि से स्वीकारता है।

स्वयं दीप बन कर नित्य जीवन को सवांरता है।

सबको यहां न्याय मिले और न कोई बंचित रहे।

वह नास्तिक जो बोल रहा उम्र भर जीवित रहे।

रविवार, 10 जून 2018

# स्कूल गीत #

है शहर के आस-पास,गांव में सबसे प्यारा ।
कोलाहल से दूर सुरक्षित है इस्कूल हमारा ।
सुन्दरता में यहां सैंकड़ों कैसे वृक्ष हरे भरे हैं।
कहीं लीची ,कहीं आम के सुन्दर पेड़ लदे हैं ।
प्रदूषण से मुक्त यहां पर,है पवन की धारा -
कहती है हर सुविधा से है ये इस्कूल हमारा ।
आमों की बगियों में जब प्यारी कोयल गाती।
बच्चो को मिलजुल रहने का वो संदेश सुनाती ।
हिलियन्स एकेडमी नाम से,है इस्कूल हमारा ।
है शहर के आस-पास ही, गांव में सबसे प्यारा ।
ममतामयी,मृदुभाषी सब,शिक्षिकाऐं हैं हमारी  ।
खूब पढ़ाती, खेल सिखाती,बातें करती प्यारी।
राष्ट्रीय पर्व पर हम मिलकर सब ध्वज फहराते ।
कदमताल के साथ हम राष्ट्र प्रेम के गीत सुनाते ।
सबका गौरव, है स्कूल वह जहांअमर है स्वच्छता ।
यही कामना करते हैं कि,खूूब मिले हमें सफलता ।


मंगलवार, 29 मई 2018

# मैं नहीं आप# मिट जाये संताप # (61)

हम चिंताओं के बोझ तले दबकर- 
रातभर सोने का उपक्रम करते हैं ।
और प्रातःअलसाई आँखों से- 
अपने मित्रों को गुडमार्निग का संदेश भेजकर,
 दिन की शुरुआत करते हैं। 
लेकिन सारा दिन चिंता में डूबे रहते,
चिन्ताओं से मुक्ति पाने के लिए-
पूजा वंदना, धूप बत्ती करना नहीं भूलते।
चिंताऐं धीरे-धीरे हमारे व्यवहार में,
परिवर्तन के कारण बन जाते हैं।
हम असामाजिक से होने लग जाते हैं ।
इसीलिए हमअस्वस्थ भी हो जाते हैं ।
हमारी अस्वस्थता-
हमें समाज से पृथक कर देती है ।
चिंता मुक्ति के कारण ढूंढने लगती है ।
सच तो यह है कि हम सदा ,
अपने बारे में ही सोचते हैं।
 दूसरों के बारे में नहीं सोचते हैं।
यदि हम दूसरों की सहायता करेंगे ,
तो दूसरे भी निश्चित हमारी सहायता करेंगे ।
इसी सकारात्मक सोच के साथ -
हम चिन्ताओं से मुक्ति पा सकेंगे।  
धार्मिक व्यवहार सेअधिक ,
सामाजिक व्यवहार में बदलाव ला पायेंगे । 
***** मैं नहीं आप,मिट जाये संताप *****

क्रिसमस दिवस

बच्चो आज सुनो कहानी तुम संत निकोलस की। सदा चला जो राहों पर अपने पैगंबर जीजस की। राजा के घर जन्मा उसे सदा गरीबों से प्यार रहा। निर्धन की सेवा...