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गुरुवार, 28 मार्च 2019

वंचित स्वर


इतनी भी बेरुखी अच्छी नहीं है  हमसे ,
जीते जागते तुुम जैसे इंसान हैं हम भी।
वतन हमारा हम ही मूलनिवासी हैं यहां,
मनुवादी व्यवस्था से परेशान हैं अब भी ।
बताऐं हाल क्या परेशाानियों का अपनी,
समाज में गैर बराबरी सेअपमानित हैं।
जानते हैं हमारी अज्ञानता पर ही आज, 
पाखंड के सभी महारथी सम्मानित हैं।
सिंन्धु घाटी की सभ्यता के  वोअवशेष, 
जो वहाँ पर खुदाई में हमको मिले थे।
गवाह हैं आज भी वो इतिहास के पन्ने,
आर्यआक्रान्ताओं से कैसे हम छले थे।
न जान पाए श्रमण संस्कृति के वाहक।
कितने क्रूर छद्मी हैं मनुवाद के  पोषक।
हमको गुलामी की बेड़ियों में जकड़ कर,
स्वयंभू बन गये हमारे राह के अवरोधक।
आज आवाज दे कह रहा है वक्त हमसे ,
कि हे मूल निवासिओ तुम एक हो जाओ।
बुद्ध धम्म पथ के पथिक बन आगे बढो ,
ये मनुवादी व्यवस्था से तुम मुक्ति पाओ।


        

शनिवार, 2 मार्च 2019

स्मृतियाँ(48)


आते-जाते हैं लोग दुनियां में,
कहां काल चक्र रुकता है।
कभी नहीं निष्काम स्नेह,
स्मृति पटल से मिटता है।

समय केआदर्श वहीं हैं,
जो समय के गीत बने हैं।
अपने जीवन के प्रवाह में,
परिवर्तन के साथ खड़े हैं।

जाने कितने खेल चुके हम,
खेलें जीवन के इन पड़ाव में।
राग द्वेष से पीड़ित जन हम,
जीते हैं क्यों आज तनाव में।

क्यों नहीं खोजा करते हैं हम,
अपने भीतर केअवगुण को।
क्यों नहीं बांटा करते हैं हम,
अपने भीतर के सद्गुण को।

आओ मिल कर हँस लें थोड़ा,
सहज बनायें  जीवन को।
शिक्षा के अवलम्बन से कुछ,
हम और बढायें उद्दीपन को।

आवागमन के शाश्वत सत्य से,
भला कहां कोई रुकता है ।
जागृत सदा ही जीवन जीता,
गीत स्मृतियों का लिखता है।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

#बीज(47)

बीज गिरता है धरती पर,माॅटी में दब जाता है।
पाकर थोड़ी नमी,चीर धरती से ऊपर आता है।
ताकत है उसमें लड़ने,कुछ साहस भिड़ने की।
चिर सत्यकथा जीवन की,उठने और गिरने की।
उठता वही जो गिरता है,सम्भलता बढ़ता है।
गिरकर उठने का साहस,तो वह नहीं डरता है।
मूल निवासी भारत के,बीजों की तरह उगते हैं।
आँसू की इस नमता से ,बट वृक्ष से बन जाते हैं।
बीज कभी क्षय नहीं होते,ए फूले और फलते हैं।
बीजों से उपवन में ना ना,सुन्दर पुष्प खिलते हैं।
उनसे ही धरती सजती है,हर दिशा महकती है।
सुरमई रंगों की रचना में,प्रेम प्रवाहित करती है।
आओ मूल निवासी,बीजों से सुन्दर चमन बनाऐं।
मूलनिवासी भारतवासी,हम स्वाभिमान जगाऐं।
प्रबुद्ध भारत की रचना में,सर्वस्वअर्पित करते हैं।
हम मूलनिवासी हाथमिलाकरआगे-आगे बढ़ते हैं।

सोमवार, 21 जनवरी 2019

#गणतंत्र दिवस

गांव गांव,शहर शहर,नारे आज गूंजते हैं।
राष्ट्रभक्त देश के,स्व संविधान  पूजते हैं
संविधान देश का,जो भीमराव लिख गये, 
उसी के सहारे ही तो, प्रजातंत्र ढूँढ़ते हैं।
               
          
मंत्र संविधान में ,समता समानता के ।
  भ्रष्टाचार अन्त को, हैं दंड विधान में।
    वंचितों को न्याय, शिक्षा का हक मिले,
     स्वतंत्रता के मंत्र सारे,रचे संविधान में।

गणतंत्र देश में,बस गण ही महान है ।
राजा नहीं कोई यहां,कोई भगवान है।
खान पान वेष भाषा,भले असमान हों,
आजादी सभी को,सर्व श्रेष्ठ संविधान है।
                    
     जन गण मन गाते,आज एक स्वर से-,
      राष्ट्र का पवित्र पर्व ,गणतंत्र अमर रहे।
       हाथ पे तिरंगा ध्वज,धम्म चक्र लहराते
       विश्व विजय को हम, कस ये कमर रहे।

आज भी हमारे बीच,ऐसे जयचंद हैं।
गणतंत्र के लिए जो,रच रहे द्वन्द्व हैं।
जात-पात धर्म की,राजनीति करते हैं,
मतदाताओं का चूसे,अब मकरन्द हैं।
   
संविधान की शपथ,आज लेंगे मिलकर,
    दुश्मनों का करें हम, मुकाबला डठकर।
     शांति अमन सदा,शान ए वतन की हो,
       फहरायेंगे तिरंगा, घरों से निकलकर ।

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

#वंचित स्वर (51)

सर्द हवा हो या हो चिलचिलाती गरमी ,
बहाता निरन्तर पसीना खूब परिश्रमी।
मयस्सर नहीं उसको दो जून रोटी भी,-
फिरभी हौसलों में, नहीं होती कोई कमी।
            सूरत बदलना चाहते हैं, वे इस पहाड़ की,
            सामने खड़ी हैं उनकी, ये पीड़ पहाड़ सी।
            मालिक लपकते हैं,जौंक की तरह शहर में,
            जो अनवरत चूस रहे हैं,लहु उनके हाड़ की।
लाचार मेहनतकशों की,परवाह किसको पड़ी है?
उनके हकों की लड़ाई,अब तक किसने लड़ी है।
देखिए कुछ तो इधर, राजनीति की बदहाली को।
जिसका कतरा कतरा,जमीन पर बिखरी पड़ी है।
             यूं बुत की तरह खड़े रहना,अच्छा नहीं लगता।
             जंग में सिपाही का भागना,अच्छा नहीं लगता।
             कुछ तो सोचना होगा,देश के नव निर्माण के लिए,
             भीड़ में शामिल तमाशा देखना अच्छा नहीं लगता।

रविवार, 1 जुलाई 2018

# मौत की डगर

जीएमओ की बस गिर गई, सैंतालीस लोग मर गये ।
एक झटके में कितने, परिवारों के सपने बिखर गये।
नैनीडांडा क्वीन गांव के पास ही, हुआ है यह हादसा ।
हंसते हुए निकले थे घरों से, क्यों काल आ गया सहसा ।
मच गई चित्कार खाई में, कुछ मौन हुए कुछ घायल थे ।
मरने वालों में, कुछ महिला बच्चे बूढ़े जवान सामिल थे।
इस होनी को अनहोनी को, हम भाग्य कहैं या भूल कहैं ।
किस किस को दोषी ठहरायें ,हम कैसे गुनाह कबूल करें ।
उत्तराखंड पृथक राज्य हो,हमने कितने सपने संजोए थे ।
उन जनसंघर्षों में सहभागी होकर कितने लाल खोये थे ।                                 भूल गये विकास की राहों को,दूर दराज पहाड़ी गावों को।
              बिजली पानी सड़क परिवहन शिक्षा की समस्याओं को ।
             बस नेता बनने की चाहत में,  सब मर्यादाएं तोड़ चुके हैं ।
             हैं चोर चोर मौसेरे भाई ,आपस में  सब गठजोड़ चुके हैं ।
           धिक्कार है ऐसे नेताओं को, यहाॅ जो झूठे गाल बजाते हैं ।
          सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली, कभी हज करने में न सरमाते हैं।
            नेता नैतिकता का पाठ छोड़ दे,तब सत्ता का मद चढ़ता है।
      सरकारों की नाकामी से ही यहाॅ अपराधों का दर बढ़ता है ।
हम भी देश के नागरिक हैं, हमभी हैं उतने ही उत्तरदायी ।
जीवन है अनमोल सभी का ,क्यों  करें कभी लापरवाही ।
घटना से आहत मेरा मन अर्पित करता है ये शब्द सुमन ।
हे चिरविश्रामी -शांति- शांति -शान्ति हो शांति नमन ।


गुरुवार, 21 जून 2018

# नास्तिक बोलता है ----(60)

  • क्यों तुम मौन हो? तुम क्योंअसमर्थ हो? 
पत्थरों में खोजते क्यों जीवन केअर्थ को।

बाहर भूखी भीड़ है बेबस लाचार खड़ी ,

बेजान पत्थरों पर उनकी आस्था जड़ी।

मकडजाल शब्दों के तथ्य हैं तर्कों से परे।

संवेदन हीन भीड़ में सबके सब हैं बहरे।

मुश्किल है समझाना परअसम्भव भी नहीं।

आस्तिक से नास्तिक हो जाना हैअच्छा कहीं।

कहता है जाग जाओ,भीड़ के पीछे न जाओ।

शिक्षित बनो तर्क करो जीवन में संघर्ष करो।

नास्तिक जो तर्क करता बुद्धि से स्वीकारता है।

स्वयं दीप बन कर नित्य जीवन को सवांरता है।

सबको यहां न्याय मिले और न कोई बंचित रहे।

वह नास्तिक जो बोल रहा उम्र भर जीवित रहे।

क्रिसमस दिवस

बच्चो आज सुनो कहानी तुम संत निकोलस की। सदा चला जो राहों पर अपने पैगंबर जीजस की। राजा के घर जन्मा उसे सदा गरीबों से प्यार रहा। निर्धन की सेवा...