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गुरुवार, 28 मार्च 2019

वंचित स्वर


इतनी भी बेरुखी अच्छी नहीं है  हमसे ,
जीते जागते तुुम जैसे इंसान हैं हम भी।
वतन हमारा हम ही मूलनिवासी हैं यहां,
मनुवादी व्यवस्था से परेशान हैं अब भी ।
बताऐं हाल क्या परेशाानियों का अपनी,
समाज में गैर बराबरी सेअपमानित हैं।
जानते हैं हमारी अज्ञानता पर ही आज, 
पाखंड के सभी महारथी सम्मानित हैं।
सिंन्धु घाटी की सभ्यता के  वोअवशेष, 
जो वहाँ पर खुदाई में हमको मिले थे।
गवाह हैं आज भी वो इतिहास के पन्ने,
आर्यआक्रान्ताओं से कैसे हम छले थे।
न जान पाए श्रमण संस्कृति के वाहक।
कितने क्रूर छद्मी हैं मनुवाद के  पोषक।
हमको गुलामी की बेड़ियों में जकड़ कर,
स्वयंभू बन गये हमारे राह के अवरोधक।
आज आवाज दे कह रहा है वक्त हमसे ,
कि हे मूल निवासिओ तुम एक हो जाओ।
बुद्ध धम्म पथ के पथिक बन आगे बढो ,
ये मनुवादी व्यवस्था से तुम मुक्ति पाओ।


        

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