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शनिवार, 2 मार्च 2019

स्मृतियाँ(48)


आते-जाते हैं लोग दुनियां में,
कहां काल चक्र रुकता है।
कभी नहीं निष्काम स्नेह,
स्मृति पटल से मिटता है।

समय केआदर्श वहीं हैं,
जो समय के गीत बने हैं।
अपने जीवन के प्रवाह में,
परिवर्तन के साथ खड़े हैं।

जाने कितने खेल चुके हम,
खेलें जीवन के इन पड़ाव में।
राग द्वेष से पीड़ित जन हम,
जीते हैं क्यों आज तनाव में।

क्यों नहीं खोजा करते हैं हम,
अपने भीतर केअवगुण को।
क्यों नहीं बांटा करते हैं हम,
अपने भीतर के सद्गुण को।

आओ मिल कर हँस लें थोड़ा,
सहज बनायें  जीवन को।
शिक्षा के अवलम्बन से कुछ,
हम और बढायें उद्दीपन को।

आवागमन के शाश्वत सत्य से,
भला कहां कोई रुकता है ।
जागृत सदा ही जीवन जीता,
गीत स्मृतियों का लिखता है।

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