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शनिवार, 7 जुलाई 2018

आओ मेरी बस्ती में (56)

संसद को रास्ता यहीं से जाता है।
शायद तुमको याद नहीं।
तुम पिछली बार भी आए थे,
तुमने भी अपने पोस्टर बैनर लगाए थे।
शायद तुमको याद नहीं।
तुम कहते हो भारत अखंड हो ।
भ्रष्टाचारियों के लिए दंड हो।
फिर क्यों भारत खंड खंड हो रहा है ।
संसद निर्द्वन्द सो रहा है ।
निस्तब्धता क्यों है इन वस्तियों में।
क्यों आदमी बेजान हो रहा है ।
शब्दमकड़जाल मत बुनो।
वंचितों के स्वर सुनो।
यहीं अयोध्या है यहीं राम भी।
यहीं गीता यहीं संविधान भी ।
आओ मेरी बस्ती मेरे गांव में ।
उस विशाल पीपल की छांव में।
तुम्हारा तन मन शुद्ध होगा ।
हमारा भारत  प्रबुद्ध होगा ।
शांति अमन मानवता होगी ।
प्रेम बन्धुत्व समानता होगी ।
न कभी किसी में द्वन्द्व होगा।
भारत तभी अखण्ड होगा ।
आओ मेरी बस्ती मेरे गांव में।
उस विशाल पीपल की छांव में।

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