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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

राखी का त्योहार

राखी का त्योहार आ गया,हो बहना काअभिनंदन।
प्रेम प्रतीक भाई बहन का,हमने माना है रक्षा बंधन।

सदियों से सुनती आई है बेचारी केवल अबला  है।
शोषित वंचित है भले  परिवार उसी से संभला है।

संविधान से मिला है समानता का स्वर्णिम कंगन।
राखी का त्योहार आया,हो बहनों का अभिनंदन।

राखी बांधने आई बहना देखो वो सबला बनकर।
कहती आत्मविश्वास से,बांधेंगे राखी हम परस्पर।

बहना को कष्ट हुआ गर,ये राखी याद दिलाएगी।
मुश्किल में हो भाई गर तो,वो बहनादौड़े आयेगी।

भाई बहन के हृदय में,हो नव युग नव प्रेम स्पन्दन।
राखी का त्यौहार आया है,हो बहना काअभिनंदन। 






स्वतंत्रता सेनानी स्व.हरकराम आर्य

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.हरकराम आर्य एक कर्मठ ,मेहनती एवं एक जुझारू व्यक्तित्व के धनी थे ।वे एक लम्बी उम्र 106वर्ष जीए।उनका जन्म 22 सितंबर 1881 को हुआ था ।उनके पिताजी का नाम पनीराम तथा माता जी का नाम श्रीमती मना देवी था।वे हमको जब अपने बारे में बताया करते थे तो अपने दादा जी कुतुबचंद का जिक्र अवश्य किया करते थे।वे बताते थे कि उनके पूर्वज कोटलिया थे जो गढ़वाल से यहाॅ  आये।यहाॅ तल्ला विरलगाॅव सल्ट आकर लोहारी करते थे ।उनके दादा व पिता जी अच्छे खासे सिद्ध हस्त लोहार थे। पिता स्व. पनीराम व माता मना देवी ने पांच पुत्र दो पुत्रियों को जन्म दिया था ।वे कहा करते थे कि उनकी बहिनें भाबर में रहती थी जो भैंसिये थे ।भाइयों में वे सबसे छोटे थे।सबसे बडे भाई दौलत राम फिर काली राम,  धनीराम हंसरामऔर सबसे छोटे हरकराम थे।हंसराम भी भाबर आ कर बस गये थे केवल चार भाई तल्ला विरलगाॅव सल्ट में रहकर लोहारगिरी करते थे।खेती-बाड़ी का काम बड़े भाई लोग संभाल लेते थे ।हरकराम स्कूल तो नहीं गये पर सामाजिक दर्शन को समझने लगे थे ।उनका मन घर पर नहीं लगता था।1918 के बाद उत्तराखंड में समाज में परिवर्तन का दौर चल रहा था एक ओर देश की आजादी के लिए लोग संघर्ष की राह पर चल रहे थे, दूसरी तरफ समाज में छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ खुलकर लोग आगे आ रहे थे।ऐसे समय पर युवा हरकराम कहाॅ चुप बैठने वालों में थे।दिनरात वे अपने साथियों के साथ जन जागरण के लिए संघर्ष कर रहे थे। कुमाऊ गढवाल मेंआर्य समाज सामाजिक कुरीतियों के लिए संघर्ष कर रही थी ।कुमाऊ में स्व.खुशीरामआर्य तथा गढ़वाल में स्वoजयानन्द भारती आर्य समाज में दीक्षित होकर प्रचार-प्रसार कर रहे थे ।शिल्पकार वर्ग जागरूक हो कर संगठित हो रहा था।जगह-जगह आर्यसमाजी प्रचारक यज्ञोपवीत करवा कर शिल्पकार वर्ग को हिन्दुत्व के लिए खड़ा कर रहे थे।वे उन्हें मूर्ति पूजा से अलग कर अन्धविश्वासों से भी मुक्त कर रहे थे।हरकराम जी भी खुशीरामआर्य के भक्त हो गये।आर्यसमाज के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में कार्य करने लगे ।यह काल जनेऊ आन्दोलन के रूप में एक ऐतिहासिक आन्दोलन हो गया।जगह-जगह सवर्ण वर्ग इस आन्दोलन के विरोध में खड़े होकर शिल्पकार वर्ग पर अत्याचार करने लगे ।खुशीरामआर्य जी इस विरोध का डठ कर सामना किया ।हरकराम जी बताते थे कि कई स्थानों पर सवर्णों का इतना विरोध था कि मारपीट मुकदमे बाजी भी बहुत हुई।वे बताते थे कि इन आन्दोलनों ने उनका जीवन ही बदल दिया।सल्ट में जहां भी कांग्रेसियों की बैठकें होती वे वहां रहते ।शिल्पकार समाज मेंअब वे लोगों के पुरोहित बन कर कर्मकांड किया करते।लोगों को सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की शिक्षा दिया करते थे।1933 में उन्होंने अपना मकान बनवाया मकान में ईडा बारखाम के मिस्त्री भीमराम थे जिनका नाम आज भी मकान के पत्थर पर खुदा हुआ है।1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर सम्पूर्ण देश में पूर्ण स्वराज का आन्दोलन प्रारंभ हो गया ।यह आन्दोलन करो या मरो के साथ चला ।क्रांतिकारी हरकराम जी को भी गिरफ्तार किया गया ।अट्ठारह महीने जेल में रहे फिर उन्होंने समाज में रह कर समाज सुधार का कार्य किया ।
       स्व.हरकराम आर्य क्रांतिकारी थे वे सुधार की अपेक्षा परिवर्तन चाहते थे ।परिवर्तन के मूल्यों को उन्होंने स्वयं अपने जीवन में उतारा।"वे कहते थे कि हमें अपने को सुधारने की निरन्तर कोशिश करनी चाहिए"। समाज में व्याप्त सामाजिक बुराइयाॅ हमारे प्रयास से ही दूर होंगी।शादी विवाह के अवसरों पर मैंने उनको भाषण देते हुए देखा।वे लोगों को समझाया करते थे कि हमें कुरीतियों को छोड़ देना चाहिए ।धूम्रपान नशाखोरी से आदमी अपने स्वास्थ्य खोकर स्वाभिमान भी खो देता है।वे कभी मूर्ति पूजक नहीं रहे।जीवन के अन्तिम वर्षों में वे बाबा साहेब डाक्टर भीमराव अम्बेेेडकर के विचार और बुद्ध के विचारों से प्रभावित थे।उनका मानना था कि उत्तराखंड में शिल्पकारों का डोली पालकी आंदोलन जनेऊ आंदोलन एक सशक्त आंदोलन रहा है ।इन आंदोलनों ने शिल्पकारों की दशा दिशा बदली।
        नौ मई 1980 को कफल्टाकांड ने उनको काफी झकझोर कर रख दिया यह बारात उनके भतीजे मोहन राम के बेटे की थी।इस बारात में उनके तीनों पुत्र रामकिशन, नरेन्द्र प्रसाद व पीताम्बर भी थे जिसमें रामकिशन शहीद हुए थे।
उन्होंने कहा कि मुझे गर्व है कि मेरे परिवार ने आज अपनी असली आजादी की जंग लड़कर अपनी राष्ट्रीयता का परिचय दिया।कफल्टाकांड को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने में उनकी पुत्री आनंदी देवी की बहुत बड़ी भूमिका रही।न्याय मिलने में सत्रह साल लग गये।
वे मानते थे कि आज अब अम्बेडकरी चेतना की आवश्यकता समाज को ज्यादा है।उनकी इच्छा थी कि वे अम्बेडकरी विचारधारा के साथ काम करें परन्तु स्वास्थ्य अब अनुकूल नहीं लग रहा था। 8 अक्टूबर  1986को स्वतंत्रता संग्राम सेनानीस्व.हरकराम आर्य का देहावसान हो गया।
       4 सितम्बर 2014को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.हरकराम आर्य जी की मूर्ति विश्व कर्म शक्ति पीठ तल्ला विरलगाॅव सल्ट परिसर में स्थापित की गई  सल्ट विधायक मा.सुरेन्द्रसिंह जीना जी के द्वारा मूर्ति का अनावरण किया गया।अब प्रति वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर विश्व कर्म शक्ति पीठ परिसर में बुद्ध  वंदना के साथ  मनाई जाती है।विगत कई वर्षों से 5सितम्बर सल्ट शहीद दिवस के पूर्व दिवस तल्ला विरलगाॅव में स्वंतंत्रता सेनानी हरकराम जी की मूर्ति की अनावरण तिधि मनाई गई ।माननीय विधायक जीना जी के प्रयास से विश्व कर्म शक्ति पीठ तल्ला विरलगाॅव सल्ट में" स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.हरकराम  स्मारक" बनाया गया।आज मूर्ति अनावरण तिथि पर गांव के लोगों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.हरकराम को कोटि-कोटि नमन कर श्रध्दांजलि अर्पित की गई ।

मंगलवार, 6 मई 2025

क्रिसमस दिवस

बच्चो आज सुनो कहानी तुम संत निकोलस की।
सदा चला जो राहों पर अपने पैगंबर जीजस की।
राजा के घर जन्मा उसे सदा गरीबों से प्यार रहा।
निर्धन की सेवा करनेको वह दिन-रात तैयार रहा।
नये नये परिधान पहनकर  बच्चों को जो भाता था।
बड़े सबेरे उनके घर में वो खिलौने रख जाता था।
हिम प्रदेश का वासी जिसका शुद्ध निर्मल मन था।
हमसे बड़ा होने पर भी उसमें हम सा  बचपन था।
एक बार की बात गांव में एक निर्धन बुढिया रहती।
तीन पुत्रियों के साथ वह एक झोपड़ी में वो रहती।
पैसे नहीं थे पास उसके और पुत्रियां जवान हो गई।
अब कैसे शादी हो इनकी वह बहुत परेशान हो गई।
इसकी भनक जब लगी संत को चुपके आया घर में।
सोने के सिक्के थैली में बन्द कर वह रख गया घर में।
सुबह उठी बहनें तीनों उन्होंने दरवाजे पर थैला देखा।
हर्षित हुए सब घर में जाना ये बदली भाग्य की रेखा। 
मानवता का कोई पुजारी जब आता है इस धरती पर।
सारे संकट दूर हो जाते रहेंगे समाज में जब मिलकर।

 



 

रविवार, 7 अप्रैल 2024

कांटों से डरो नहीं

फूलों का गर शौक हैतो काटों से डर कैसा।
इरादा मजबूत हैतो ख्याल ये मुकद्दर कैसा।
कभी धूप कभी छांव रहा करती जिन्दगी में,
साथ न हो हमसफ़र का तो ये सफर कैसा।
 
राग  में डूबे रहो तो मन में ये अनुराग कैसा।
छल कपट प्रपंच हैं भीतर फिर त्याग कैसा।
जागृत नहीं प्रज्ञाऔर चित अशुद्ध रहता हो,
गर्व न हो जिस पर हमें फिर वो काम कैसा।

बुधवार, 30 अगस्त 2023

खुशियां

सार्थक  सोच  है जिनकी,
उन्हींको वो खुशी मिलती।
जमीं   हो  धूल   सीसे  में,
कभी सूरत नहीं  दिखती।

कोई   खोजे  शिलाओं  में,
ये  कोई   भावनाओं   में।
तलाशी  हैं   मैंने   खुशियाँ, 
सभी    संभावनाओं    में।

खुशी  से  आंकते  हैं  हम,
अपना  मूल्य जीवन  का।
खुशियां  बांट ली जिनको, 
खुशी में प्यार  है  उनका।

ये जीवन  प्रेम की  सरिता,
इसे   अविरल   बहने  दो।
किसी की  राह मत  रोको,
खुशी  के फूल  खिलने दो।

खुशी दिखती जहां हमको,
वहीं   तो  प्रेम  है  समझो।
प्रेम  के  बिना      जीवन,
पूरा   वीरान  ही  समझो।

दिया  है  स्नेह जो  हमने-
उसी  से  तो  हुआ  स्नेही,
उसी के पास खुशियों का,
बड़ा भंडार  तुम   समझो।
 

चांद से रिश्ता पुराना(चन्द्रयान-3)

चंदा  से  है  रिश्ता हमारा पुराना।
बच्चों का है वो प्यारा चंदा मामा। 
कल्पना कवि की सुन्दर  सलोना,
चांदनी रात का अनुपम खिलौना

महान हैं सारे वैज्ञानिक हैं हमारे । 
जिन्होंने ये कदम चांद पर उतारे। 
फहराया तिरंगा उन्होंने चांद पर।
नाजहै हमको चन्द्रयान काज पर। 

शिल्पकारों का वर्चस्व  बना रहे,
खोज विज्ञान की सदा होती रहे।
आगाज है ये नवयुग निर्माण की,
वैज्ञानिक सोच जन कल्याण की।

स्नेहिल सुप्रभात  संदेश चांद का।
देख लिया हमने भी देश चांद का।
तिरंगा फहराया आभार है उनका।
वैज्ञानिकों ने दिया रास्ता चांद का।

इसरो इतिहास आज के दिन का।
कमाल है न्यारा चन्द्रयान तीन का।
देश का गौरव पहुंचायाआसमां पर।
सबको है गौरव ये भारत महान पर।







रविवार, 27 अगस्त 2023

गरजते हैं बरसते नहीं

छाये हैं घने बादल आसमां में, जरा देखो।
बरसने की तैयारी में हैं घटाऐं, जरा देखो। 

गरजने वाले बरसते नहीं हैं,ये कहावत है,
आसमां से हवा हो गए बादल, जरा देखो।

पांच सालों में  लहलहाती फसल वोटों की,
कौन काटेगा इस बार ये फसल, जरा देखो।

गरज रहे हैं बादलों की तरह यहां नेतागण, 
अब की बार कौन हाथ मारेगा  जरा देखो।

सड़कों पर खेतीहर मजदूर किसान बैठे हैं,
महंगाई से त्रस्त हैं बेरोजगार , जरा देखो।

कई दलबदलू मौकापरस्त नेता  हैं ताक में,
किधर लपकेंगे नेता जी इसबार जरा देखो।

प्रजातंत्र के नाम पे जनता गुमराह होती है,
प्रजा को कौन प्रसाद चटाता है जरा देखो।



गुरुवार, 20 जुलाई 2023

जंग लड़नी चाहिए

जिन्दगी है,जंग तो ये जंग लड़नी चाहिए।
है चुनौती जिंदगी,स्वीकार करनी चाहिए।

पैरों में हैं बेड़ियाँ इनसे हैं हम जकड़े हुए।
जालसाजों की टेढ़ी,दुम को हैं पकड़े हुए।
होगया है येउजालाआँख खुलनी चाहिए।
जिंदगी है जंग तो ये  जंग लड़नी चाहिए।

खाते आए ठोकरें ये दुत्कार सहते आ रहे।
बंधुवा मजदूर उनके हैं काम करते आ रहे।
स्वाभिमानी हो गये तो जंग लड़नी चाहिए।
है चुनौती जिंदगी स्वीकार  करनी चाहिए। 

जिसके हाथों में कलम हैआगे बढ़ते वो रहे।
भाग्यऔर भगवान के पीछे भरोसे हम रहे।
हो गए आजाद तो नयी बात करनी चाहिए।
है  चुनौती  जिंदगी स्वीकार  करनी चाहिए। 

जिंदगी है जंग तो अब जंग लड़नी चाहिए ।
है  चुनौती  जिंदगी स्वीकार  करनी चाहिए। 
@स्नेही




सोमवार, 3 अप्रैल 2023

रिश्ते

पारिवारिक रिश्ते हैं अब दिखाने के लिए।
वृद्धाआश्रम हैं जिन्दगी गुजारने के लिए।

अन्तिम बार बेटा मिलनेआया वृद्धाश्रम में,
वो भी अपनी मां का कंगन चुराने के लिए।

धन दौलत है तो  रिश्ते हजार बन जाते हैं,
मगर  समय नहीं है रिश्ते निभाने के लिए।

मदद  की है तुमने  कभी जिन  लोगों की,
मदद को मशहूर हैं बहाने बनाने के लिए। 

रिश्ते नहीं तो  परिवार कहां  रह गये अब,
रिश्ते रह गये  कागज में दिखाने के लिए।

संयुक्त परिवार टूटे एकांकी  हो गए  सब,
मां कहांअबआया हैं दूध पिलाने के लिए। 


सुहाना मौसम

वाह !कितना सुहाना हो गया मौसम,
जब से यहाॅ बारिस हो रही झमाझम। 
गर्मी का हाल  पानी उबलने लगा था।
दावानल खुद-ब-खुद सुलगने लगा था।
पसीने से तरबतर,मानो नहा लिए हम।
वाह ! कितना सुहाना हो गया मौसम,

जब से यहाँ बारिस हुई है झमाझम।
मूसलाधार हो रही न हो रही है कम।
कूलर एसी काअसर न दिख रहा था।
पंखा भी छत से आग उगल रहा था।
भीषण गर्मी में बस घुट रहा था दम।
वाह! कितना सुहाना हो गया मौसम।

बूंदों ने धरती की तपन कम करदी।
प्राणों में जीवन की कल्पना भर दी।
लद जायेंगे बेल फलियों से हरदम। 
वाह कितना सुहाना हो गया मौसम। 
जब से यहाॅ बारिस हो रही झमाझम।
वाह! कितना सुहाना हो गया मौसम।


रविवार, 1 जनवरी 2023

बखतकआंखर


यूं दिन,महैंन,सालों कैं,लैंरों गठ्यांण पारि।
बची छोंआज तक ,हम नयीं पुराणों पारि।
मैंस कस कसआय,सनातन क्वे नि रहय।
क्वे काम कैगय,क्वे क्वर फसक मारिगय।

गीत पैली नई हैनी,वींभोव पुराण है जानी।
चानैं चानैं बखत कैं,लोग तिथांण नै जानी।
बखतकआंखर जैलि बांच, जैलि वी जांच। 
ऊ दुनी में य बखतक पछ्याण धरि जांछ।

नौंसाल भेटनै रया,भल स्वींण देखनैं रया। 
तंदुरुस्त सुखी रया,घर पन  पूजनीय रया।
क्य नौं क्य पुराण,भौलभौल जो वी समांण।
नौं साल सबुलै नवांण,पुराण सबुलै तपांण।

आओआज खूब खितखित कैं हंसि ल्योंल।
भोव  हैंणि हम सबों  कैं खूब  याद  कौंल। 


सोमवार, 12 दिसंबर 2022

यादों में आती रहो

मेरे शब्दों को तुम गुनगुनाती रहो। 
सुरों से  मधुर राग अलापती रहो।

मेरी ये धड़कन तुम्हारा ऐहसास है,
तुम यूँ धड़कन बन मुस्कुराती रहो। 

प्यार की धड़कनों में कभी दर्द हो।
तुम धड़कन पे नया गीत गाती रहो। 
 
तन्हाइयों  में गर भूल भी जाऊं तो,
तुम हमेशा मेरी यादों में आती रहो।

कुछ तो थी बात गुजरे हुए जमाने में,
हमको जमाने की याद दिलाती रहो।

मैं चलता  रहूँ हमेशा जीवन पथ पर,
तुम साया  बनकर  पीछे आती रहो।

रविवार, 11 दिसंबर 2022

आग हैं छू नहीं सकते

आग हैं छू नहीं सकते,
 मगर प्यार इसके ताप से।
  कितने काम की है आग,
   जरा पूछिएअपनेआप से।

हर जात की लकड़ियां,
 भष्म हो जातीआग में।
  जात का अभिमान सारा,
   मिल जाता  है खाक में।

आग ही है सब कुछ यहां,
 इसी  पर  तो  हैं  निर्भर।
  छू नहीं सकते इसे हम,
   ये  है  मेहरवां  हम  पर। 

जब  कपकपाती  ठंड हो,
 तब तन अकड़ता ठंड से।
  बर्फ   सी  जमती  परतें,
   अकड़न भरी  घमंड से।

बैठ  कर    पास इसके,
 पिघलने लगती है  परत।
  जान  लेते  हैं अर्थ  हम,
   मिटाकर  दिल से नफरत।

जलकर   राख   जब  हो  ,
 बभूति   माथे  लगा  लेते।
  आस्थावान  होकर   हम, 
   डुबकी सागर में लगा लेते।

जब अछूत के पास जाओ,
 ताप से नफरत मिटा लेना।
  दर्प  हो  जाये राख तो तुम ,
   बभूति को माथे लगा लेना।









शनिवार, 10 दिसंबर 2022

हालात.....

महंगी हो गई  हर चीज, 
 बाजार जा के क्या करूँ।
  पल में नहीं है एक धेला,
   मैं किसको  क्या खरीदूँ।

पास जितना भी प्यार था,
 सब कब का लुट चुका।
  रहने को जो भी ये घर था,
   वो अदद भी बिक चुका।

बस  बेघर हो गया हूँ अब,
 इधर उधर मैं भटक रहा। 
  थर थरा रहे हैं अब कदम,
   चलने में  दम निकल रहा।

अब नजर भी कम हो गई,
  कैसे किसी को पहचान लूँ।
  जाकर किसी दुकानदार से,
   अब थोड़ा सा उधार मांग लूँ।

मशाल

निकल पड़े लेकर मशालें,
हम गांव घर  शहर शहर।
ये कर दिया ऐलान हमने,
चुप्पी नहीं अब जुल्म पर।

यह  जिस्म है फौलाद की,  
शोले  हमारी  मुट्ठियों  में।
जिन्दगी  गुजरी   बहुत  है,
जलती हुई इन भट्टियों में। 

बांधकर सर  कफन अब,
युग बदलने  चल  पड़े हैं।
कारवां के साथ मिल कर, 
हम हर कदमआगे बढ़े हैं। 

हम आग  हैं    छूना  नहीं,
छू  लिया  जल   जाओगे,
वक्त को   समझो नहीं तो,
फिर  बहुत  पछताओगे।

अब तोड़  देंगे  बेड़ियाँ हम, 
आत्म  निर्भर  खुद  बनेंगे।
शिक्षा का अवलम्ब लेकर,
अपना  दीपक  खुद  बनेंगे।

याद बहुत आती है

गुजारे हैं  जो  लम्हें  तुम्हारे साथ,
उन लम्हों की बहुत यादआती है।
वक्त का  कुछ  पता  नहीं चलता,
कब सुबह कब रात ढ़ल जाती है।

लिखता हूँ खत आज भी तुमको,
पर खत काफी लम्बे हो जाते हैं।
मन मोहनी घटाऐं  जब घिरती  हैं,
बरसती नैनों से खत भीग जाते हैं।

तमाम तुम्हारे  भीगे हुए खत यहां,
ये मेरी सारी कविताऐं हो जाती हैं।
प्रकाशित हो जायेगी फिर किताब,
उन लम्हों की बहुत याद आती  है।

शब्दों के साथ खेलते दिन गुजारना,
अक्सरआदत सी होगईअब हमारी।
इन  शब्दों को जब भी तराशता हूँ ,
हरेक शब्दों में देखता सूरत तुम्हारी।

अब वक्त का पता कुछ नहीं चलता,
कब  सुबह कब  रात ढ़ल जाती है।
गुजारे हैं जो लम्हें हम दोनों ने साथ, 
उन लम्हों  की बहुत  याद आती है।







मंगलवार, 29 नवंबर 2022

बचपन

मैंने भी देखा है बचपन,
 गाँव की पगडंडियों में।
  नंगे पैरों  पैदल  चलते-
   लाते कांफल कंडियों में। 

लकड़ी की तख्ती लिए,
 वहां स्कूल को जाते हुए।
  जंगल से लकड़ी बटोरे,
   गाय बकरी चराते हुए। 

गुल्ली डंडा खेल खेल में,
 साथियों से लड़  जाना।
  बातों बातों में ही अपने,
   साथियों से भिड़ जाना।

मैंने भी देखा है बचपन,
 गाँव का  प्यारा बचपन।
  सावन बरसता रोज ही,
   वो बेचारा प्यासा बचपन।

ये बंदिशें.......

हमें बांधकर रखा जिसने,
 उसको ही हम   पूज रहे। 
  जीवन  भर बंदिश  में ही,
   हम हर  वक्त   जूझ  रहे।

हमेंअबला कहके जिसने,
 हाथों में  बंधन डाल दिए।
  मर्यादा की चिता लगाकर,
   सपने  हमारे  जला  दिए।

भाग्य  व  भगवान भरोसे,
 लिखी ऐसी जीवन गाथा।
  सीता  और  द्रौपदी जैसी ,
   यह  नारी की रही व्यथा।

जागें अब  हम तोड़ें बंधन,
 शिक्षित हो संविधान पढ़ें। 
  समझेंअपनेअधिकारों को,
   आज विज्ञान कीओर बढ़ें।

अब त्यागें पुरानी परम्परा,
 लड़का लड़की में न भेदकरें।
  रूढ़िवाद के चक्कर में हम,
   कुंडलियों का न उल्लेख करे।













रविवार, 27 नवंबर 2022

मना लिया करो

लग रही है गर आग तो बुझा दिया करो।
तब हाल अपने दिल का सुना दिया करो।

चुप रहने से कभी हालात नहीं बदलते,
रूठे हैंअपने तो उनको मना लिया करो।

दूर रहने से गलत फहमियां हो जाती हैं,
वक्त पर अपनों से बात कर लिया करो।

वो भी इतने बुरे नहीं थे जमाने में कभी,
उन्हें भी जमाने की याद दिला दिया करो।

देख कर दुनिया हमें सपना सा लगता है।
कभी सपनों में अपनों के खो जाया करो।

 



 







शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

संविधान दिवस

ऐतिहसिक छब्बीस नवम्बर, 
है संविधान  दिवस  हमारा। 
इसकी सुचिता संरक्षण को,
यह पावन संकल्प हमारा ।

नफ़रत न हो कभी दिलों में,
आपस में रहे ये भाई-चारा।
मानवता हो हृदय में सबके, 
कहता है  संविधान हमारा। 

कैसे देश चले अपना यह,
कैसी व्यवस्था हो इसकी,
सबको हक मिले यहांपर,
जैसी योग्यता हो जिसकी।

हर हाथ को काम मिले व,
उचित काम के  दाम मिले,
घर घर ढेरों खुशियों फैले,
डाली -डाली  फूल  खिले।

क्या हैं मूलअधिकार हमारे,
संविधान में है सब अंकित।
कर्तव्य हमारे  निर्धारित  हैं, 
कोई न्याय से रहे न वंचित।

समता समानता बन्धुत्व पर,
आधारित संविधान हमारा।
राजनीतिक सामाजिक और-
आर्थिक न्याय से राष्ट्र संवारा।

संविधान के जनक आप हैं,
डाक्टर भीमराव अम्बेडकर।
कोटि कोटि नमन  करते  हैं,
चरणों में हम शीश झुकाकर। 









राखी का त्योहार

राखी का त्योहार आ गया,हो बहना काअभिनंदन। प्रेम प्रतीक भाई बहन का,हमने माना है रक्षा बंधन। सदियों से सुनती आई है बेचारी केवल अबला  है। शोषित ...