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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

#वंचित स्वर (51)

सर्द हवा हो या हो चिलचिलाती गरमी ,
बहाता निरन्तर पसीना खूब परिश्रमी।
मयस्सर नहीं उसको दो जून रोटी भी,-
फिरभी हौसलों में, नहीं होती कोई कमी।
            सूरत बदलना चाहते हैं, वे इस पहाड़ की,
            सामने खड़ी हैं उनकी, ये पीड़ पहाड़ सी।
            मालिक लपकते हैं,जौंक की तरह शहर में,
            जो अनवरत चूस रहे हैं,लहु उनके हाड़ की।
लाचार मेहनतकशों की,परवाह किसको पड़ी है?
उनके हकों की लड़ाई,अब तक किसने लड़ी है।
देखिए कुछ तो इधर, राजनीति की बदहाली को।
जिसका कतरा कतरा,जमीन पर बिखरी पड़ी है।
             यूं बुत की तरह खड़े रहना,अच्छा नहीं लगता।
             जंग में सिपाही का भागना,अच्छा नहीं लगता।
             कुछ तो सोचना होगा,देश के नव निर्माण के लिए,
             भीड़ में शामिल तमाशा देखना अच्छा नहीं लगता।

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

भौनी दा(27)

दगड़ू भौनी दा,जनुहैं भवान सिंह कौंनी।
आज कल अब ऊं बल दिल्ली हौन रौनी ।
हम ननछना बटि स्कूल,एक दगड़ै  गय।
एकै स्कूलम, हम एकै दर्जम दगड़ै रय।
हमुलि गुल्ली डंडा,घुसघुसि दगड़ै खेलि।
बटपन लुुुुकण पणज्यू मार दगड़ै झेलि।
हम एक बटी दस तक स्कूल दगड़ पढ़।
जो साल पास हय और वी साल विछड़।
अपण दद दगै भौनी दा तलि हैंणि नै गय, 
इज बौज्युक लाडिल हम घर पनै रै गय।
साल द्वी साल तक चिठि पतर लिखनै रय।
बखतक दगड़, फिरि हमलै सब भूलि गय।
भौनीदा कैं वेति दिल्लीक हवा रास ऐगे ।
घरपन मेरि मास्टरीक बस एक तलाश रैगे। 
कब ब्या हौय ? यूॅ कब नन तिन हय ?
बचपना दिन अपण हम  सब भूलि गय।
घरपन सैंणिक कचकचाट  सुणनैं रय।
राती ब्याव हम स्वीणोंक जाव बुणनें रैगय ।
येति दिन रात हम दौड़नै रिश्त बड़नैं गय।
य उमरकि किताबक हर पन्न पलटनै रय।
लोगोंल बतायआज भौनी दा घर ऐ रैंई।
अपण दगै ननतिन पहाड़ घुमुहणि ल्य रैंई।
मैं ब्याव एक झप्पाक  मिलहणि क्य गोय।
चहा  पीनैं गपशप  मारनैं झित वैं रै गोय।
उमर बिति हम पहाड़ हैंणि के नि कर सक।
अपण ठाठ-बाट मारनैं रै गय कोरि फसक।







गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

# मुल मुल हंसनै रया (28)

मिठ-मिठ, भौल बुलानें रया।
खितखित,मुलमुल  हंसनै रया।
            खुटों तुमर कभैं कन झन बुड़ौ।
            मूण कभैं क्वे आँस झन पड़ौ।
             सगुन आंखर तुम लेखनैं रया।
             खित खित,मुल मुल हंसनैं रया।
             नौंसाल तुमुहैंण दैंण है जाऔ।
              दूधभात खूब  खैहण है जाऔ।
              अणी जणियां क्वे भूख न रहौ।
              नाजैल भकार तुमरभरीयै रहौ।
अपण -पराय सब देखनैं रया।
खित खित,मुलमुल हंसनैं रया ।
             घर-बौंण डव बोटि हरिया रहैं।
             खल्यत रुपयोंल तुमरभरियै रहैं।
             बट-घट,व्यापारम  बरकत  रहौ।
             धिनाईल ठेकि-डौकौ भरियै रहौ।
दिन-रात भल स्वींण देखनै रया।
खित खित,मुल मुल हंसनै रया।
             तुमूपरि कभैं कैक दोष न लागौ।
             रौल गध्यरोंक छौव कभैं न जागौ।
             खुशि देखिक चौड़ चाकौ है जया।
             सबोंकैं उज्याव तुम दिखानैं रया।
द्यप्तोंक थानम,तुम द्यू बावनै रया।
खित -खित,मुल- मुल हंसनैं रया।
            नौं साल पारि, तुम नौं गीत गाया।
             परदेश जाई छैं,उनुकैं घर बुलाया।
            अपण मुलुक कैं,छोड़ि झन जया।
             ननों कैं रोजगार,तुम एती दिलाया।
फूलदेई घी त्यौहार, एती मनाया।
खित-खित,मुल- मुल  हंसनैं रया।
           बीती बातों कैं अब भूलि जाणौ।
           बखत कैं नौं उज्याव दिखाणौ।
           खेती-बाड़ीक नई नीति बनाणौ।
           भरपूर फसल फल फूल उगाणौ।
नौं साल पारि सब नौं गीत गाया ।
खित-खित,मुल-मुल  हंसनैं रया।
 

रविवार, 26 अगस्त 2018

🔰एक नया त्यौहार मनाऐं (52)

एक नया त्यौहार मनाऐं,हम खुशियों से परिवार सजाऐं।

कभी राग न  द्वेष किसी से,कभी न हो विद्वेष किसी से।
हिल मिल रहकर देखें सपना,ऐसा लगे  घर  हो अपना।
अगर रूठ कर कोई बिछुड़े  मिलकर सब उसे मनाऐं।
हम एक नया त्यौहार मनाऐं ,खुशियों से संसार सजायें।
      
जाति धर्म की बात न हो,किसी से अशिष्ट संवाद न हो ।
रिश्तों में हो प्रेम समर्पण प्रबुद्ध राष्ट्र को सब हो अर्पण।
समृद्ध राष्ट्र ,समृद्ध समाज को,मिल कर स्वस्थ बनाऐं ।
हम एक नया त्यौहार मनाऐं खुशियों से संसार सजाऐं ।
      
यहां कोई पूरब पश्चिम रहता,कोई उत्तर दक्षिण वासी ।
भाषा वेश रंग भले अलग हों,हम सब हैं भारतवासी ।
भेदभाव का भ्रम तोड़कर,सुन्दर सा उपहार सजाऐं।
एक नया त्योहार मनाऐं खुशियों का परिवार बनाऐं।



शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

🌹प्रातः स्मरणीय व्यक्तित्व -मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा 🌹

उत्तराखंड में शिल्पकारों के प्रेरणास्रोत रहे  हैं स्वoरायबहादुर मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा।वे सम्पूर्ण उत्तराखंड में ही नहीं,अपितु जहाॅ भी प्रवासी शिल्पकार हैं बड़े गर्व के साथ उनकी जयन्ती मना कर उन्हें याद करते हैं और  उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हैं।आज अम्बेडकरी चेतना के फलस्वरूप समाज सुधार के लिए उनके प्रयासों को दृष्टिगत कर उनको उत्तराखंड का अम्बेडकर कहा जाता है।स्वoरायबहादुर मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा जी का जन्म 26अगस्त1887 को अल्मोड़ा में हुआ ।उनके पिताजी का नाम गोविंद प्रसाद तथा माता जी का नाम गोविंदी देवी था।सन् 1892 में प्राइमरी शिक्षा और1902 में हाईस्कूल परीक्षा उन्होंने उच्च श्रेणी में विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की।प्रतिभा के धनी स्वo हरिप्रसाद टम्टा जी के लिए तत्कालीन परिस्थितियां बड़ी कठिन थी ।जहाॅ  कि एक ओर देश की आजादी के लिए संघर्ष और दूसरी तरफ जातीय अस्पृश्यता का घोर दंश।संघर्ष के इस दौर में उनको भी अपनी भूमिका निर्धारित करनी थी।उन्होंने सन्  1905 में शिल्पकारों की दशा सुधारने के लिए  टम्टा सुधारिणी सभा का गठन किया जो आगे चलकर शिल्पकार सभा के रूप में परिवर्तित  हो गई।तत्कालीन समय पूर्ण रूप से समाज सुधार के दौर से गुजर  रहाथा।कुमाऊऔर गढवाल लोग धर्मांतरण कर रहे थे समाज में    छुआछूत जैसी कई सामाजिक बुराइयाॅ थी।शिल्पकार शोषित और असंगठित थे।
               कुमाऊ गढवाल मेंआर्य समाज जैसी संस्थाओं के माध्यम से धर्मांतरण  रोकने और अस्पृश्यता उन्मूलन के कार्यक्रम चलाए जा रहे थे ।कुमाऊ में स्व.खुशीरामआर्य तथा गढ़वाल में जयानन्द भारती शिल्पकारों के शुद्धिकरण के लिए जनेऊ आन्दोलन कर रहे थे तो इधर स्व हरिप्रसाद टम्टा जी शिल्पकारों के लिए सरकार से  बेहतर शिक्षा की सिफारिश कर रहे थे,और आर्थिक विकास को लेकर संघर्षरत थे।स्व.टम्टा जी ने कई विद्यालय खोल कर शिल्पकारों के लिए शिक्षा का प्रबंध किया।वे एक कुशल  पत्रकार भी थे उन्होंने 1934 में समता साप्ताहिक पत्रिका का सम्पादन कर शिल्पकार समाज को जागरूक करने एवं उनके साथ हो रहे अमानवीय अत्याचारों को प्रकाशित करने का कार्य किया।अल्मोड़ा जिला बोर्ड के मनोनीत सम्मानित सदस्य भी  रहे।उनकी प्रतिभा को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने उन्हें 1935 में विशेष मजिस्ट्रेट मनोनीत किया।उन्होंने कई शिल्पकार सम्मेलनों        की अध्यक्षता की सम्मेलनों के माध्यम से शिल्पकारों के लिए भूमि
आवंटन के लिए संघर्ष किया।आज आजादी के सात दशक बाद भी
शिल्पकार वर्ग सामाजिक आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से उपेक्षित है। उनकोबोट बैंक के रूप में उपयोग किया जा रहा है।आज हरिप्रसाद टम्टा जी की प्रासंगिकता अधिक है उनके जीवन दर्शन को आज समझने की आवश्यकता है ताकि लोगआर्य समाज की जकड़न से    बाहर निकलकरअम्बेडकरीविचारों को समझें।शिल्पकारों को अब  इस दिशामें हमकोअम्बेडकरी विचारों को प्रोत्साहित एवं प्रसारित करने की आवश्यकता है।
        समतामूलक समाज के लिए सही बुद्ध का सत्पथ ही है।यही स्व.मुन्शी हरिप्रसाद टम्टा जी की मंशा रही होगी।इसी श्रद्धा के साथ उन्हें कोटि-कोटि नमन।


गुरुवार, 16 अगस्त 2018

श्रद्धांजलि

तुम अटल, विश्वास अटल ,तुम्हारा ज्ञान अटल था ।
काल चक्र के साथ तुम्हारा हरअभियानसफल था।
तुम बढते गये निरन्तर,तुमने कभी हार नहीं मानी।
तुम मानवता से परिपूर्ण  थे निर्भीक स्वाभिमानी।
तुम जनप्रिय जन नायक नव युग प्रेरणा दायक थे।
जाति धर्म सम्प्रदाय से ऊपर राष्ट्र धर्म सहायक थे।
तुम कवि लेखक रचना धर्मी प्रखर वक्ता युगदृष्टाथे।
इस नवभारत निर्माण के तुम निर्भय अभिकर्ता थे।
हो गये आज तुम मौन! काल चक्र भी रुक गया है।
हे अटल !श्रद्धांजलि !ये राष्ट्रध्वज भी  झुक गया है।
अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।  !      भावपूर्ण श्रद्धांजलि  !

सोमवार, 30 जुलाई 2018

# बरषने दो(53)

बरषने दो बादलों को आज जी भरकर ।
आने दो हवाओं को थोड़ा तूफान बनकर।
हम भी देखते हैं कितना दम है इनमेंआज,
खड़े हैं हम भी यहाॅ अपना  सीना तानकर।
                जानते हैं बादल दो-चार दिन बरसेंगे।
                इनको हवायें कहीं उड़ाकर ले जायेंगे।
                छोड़ जायेंगे जमीं अपनी खामोशियां।
                हम ही उनको खुशियाॅ लौटाने आयेंगे।
बादल नहीं होते, मगर झुलसाती गर्मियां-
होती ,ये हाड़ कपकपाने वाली वो सर्दियां। 
सीख लेते हैं बादलों से उड़ना आसमां में,
छोड़कर आ गये हैं जो अपनी हठधर्मियां।
               बहुत देखा है हमने भी बादलों का फटना।
               लोगों काअन्धेरों से भरे  राहों में भटकना ।
               मगर सम्भलते हैं अपनी राहों में वो अक्षर-
               जो भिज्ञ हैं जीवन में स्वयं सन्तुलन रखना।
               

राखी का त्योहार

राखी का त्योहार आ गया,हो बहना काअभिनंदन। प्रेम प्रतीक भाई बहन का,हमने माना है रक्षा बंधन। सदियों से सुनती आई है बेचारी केवल अबला  है। शोषित ...